कोरोना कालः बच्चों का रखें विशेष खयाल

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लॉकडाउन के बाद से बंद विद्यालय अगले महीने से खुलने जा रहे हैं। जिसके मद्देनजर बच्चों को स्कूल भेजने में कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में लाॅकडाउन से इतर बच्चों की सामान्य दिनचर्या में लाने के लिए एम्स ऋषिकेश के विशेषज्ञ चिकित्सकों ने सुझाव ​दिए हैं। चिकित्सकों का सुझाव है कि पिछले करीब 7 महीने से घरों तक सीमित रहे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर अभिभावकों को विशेष ध्यान देना होगा।
कोविड19 के विश्वव्यापी प्रकोप के चलते मार्च 2020 में देशभर में हुए लाॅकडाउन के बाद से अक्टूबर तक सात महीने का लंबा समय बच्चों ने घरों की चाहरदिवारी में बिताए हैं। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस की वजह से इन हालातों का सामना आंगनबाड़ी केंद्रों में जाने वाले नौनिहालों से लेकर अन्य कक्षाओं के विभिन्न आयुवर्ग के स्कूली बच्चों को करना पड़ा है। मगर सरकार अब सरकार नवंबर माह से स्कूलों को खोलने की तैयारी में जुट गई है, जिससे लंबे समय बाद बच्चों को स्कूल जाने के लिए घरों से बाहर निकलना होगा। ऐसे में उन्हें शारीरिक और मानसिक तौर पर विभिन्न तरह के बदलावों से भी गुजरना पड़ सकता है।

एम्स निदेशक पद्मश्री प्रोफेसर रवि कांत जी ने बताया कि कोविड-19 ने अभिभावकों में बच्चों के प्रति व्यापक चिंता पैदा की है। लिहाजा इस बीमारी के दुष्प्रभावों को लेकर माता-पिता द्वारा आशंकित होना और बच्चों की सुरक्षा के बारे में चिंता करना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि बच्चों में स्वच्छता बनाए रखने के लिए उन्हें साबुन से बार-बार हाथ धोने के लिए प्रेरित करना जरूरी है। बच्चों में विटामिन- डी की कमी नहीं हो, इसलिए धूप में थोड़ी देर परस्पर 1 से 2 मीटर की दूरी बनाते हुए और मास्क पहनकर खेलने दें। साथ ही स्क्रीन टाइम कम करने के लिए उन्हें किताबें पढ़ने, व्यायाम करने और परिवार के साथ समय बिताने के लिए उनमें रुचि पैदा करनी चाहिए।

इस बाबत एम्स ऋषिकेश के कम्यूनिटी मेडिसिन और पीडियाट्रिक विभाग ने अभिभावकों को सलाह दी है कि लॉकडाउन के करीब 7 माह के लंबे समयांतराल में पूर्णरूप से घर के माहौल में ढल चुके प्राथमिक व मीडिल कक्षाओं के बच्चों को अब लंबे समय बाद स्कूल जाने में कई तरह की कठिनाइयां आ सकती हैं। लिहाजा स्कूल खुलने व पाठन- पाठन शुरू करने के प्रारंभिक दिनों में बच्चों को पहले से अधिक​ प्यार और भावनात्मक लगाव के साथ स्कूल के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही शुरुआत में उन्हें संबंधित पाठ्यक्रम के महत्वपूर्ण लेक्चर्स में शामिल किया जाए, जिससे छात्र धीरे-धीरे स्कूल टाईम के अनुरूप अपने मनोम​​स्तिष्क को तैयार कर सकें।

कम्यूनिटी एंड मेडिसिन विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डा. मीनाक्षी खापरे ने इस बारे में बताया कि अब तक घरों में ही चल रही ऑनलाइन कक्षाओं के साथ-साथ खेलकूद आदि शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन आना स्वभाविक है। लिहाजा उन्हें इस तरह के माहौल से उबारने व बच्चों की शारीरिक ऊर्जा को चैनलाईज करने की आवश्यकता है। इसके लिए बच्चों को विभिन्न खेलों, ड्राईंग, पेंटिंग, अभिनय, बागवानी, खाना बनाने और घर की साफ-सफाई में शामिल किया जा सकता है। इसके साथ ही अभिभावकों को बच्चों के विचारों और भावनाओं के अनुरूप ही अपनी प्रतिक्रिया देनी चाहिए।

कोविड-19 के कारण बच्चों में शारीरिक और मानसिक बदलाव आने व उनके उपायों के बारे में सामुदायिक एवं पारिवारिक चिकित्सा विभाग की डा. रुचिका गुप्ता और डा. श्रेया अग्रवाल ने बताया कि इस समय बच्चों के साथ तनावमुक्त बातचीत के साथ-साथ उनकी भावनाओं और परेशानियों को साझा करने की नितांत जरुरत है। इसके अलावा उन्हें स्वस्थ आहार उपलब्ध कराना, नियमित व्यायाम के लिए प्रेरित करना, बच्चों में कौशल विकास की रुचि विकसित करना और उन्हें रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखना चाहिए। उनमें आत्मसम्मान और आत्मविश्वास पैदा करने के लिए हमें उन्हें टीम भावना से कार्य करना सिखाना होगा। उन्होंने बताया कि जब बच्चे टीमवर्क से कार्य करते हैं तो उनमें संचार, स्फूर्ति, सामाजिक और भावनात्मक कौशलता का भी विकास होता है। कहा कि खेल गतिविधियां बच्चों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। फिलहाल स्कूल भले ही बंद हों मगर इन सब गतिविधियों को बच्चों में परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा मिलकर भी जारी रखा जा सकता है।

इंसेट विशेषज्ञ चिकित्सकों के अनुसार लाॅकडाउन के बाद काफी समय तक घरों में रह रहे बच्चों में विटामिन- डी की कमी का होना स्वाभाविक है। सूर्य के प्रकाश के संपर्क में नहीं आने से शरीर में विटामिन- डी की कमी होने लगती है, जिसकी वजह से हड्डियों में कमजोरी, मांसपेशियों के विकास में कमी के साथ साथ बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार एक बच्चे को प्रतिदिन 600 यूनिट विटामिन- डी की आवश्यकता होती है। इस कमी को दूर करने के लिए उन्हें प्रतिदिन 30 मिनट से 1 घंटे तक गुनगुनी धूप सेंकना जरूरी है। साथ ही बच्चों में विटामिन- डी की कमी को पूरा करने के लिए इस विटामिन वाले खाद्य पदार्थ जैसे मछली, अंडा, मशरूम, दूध व दही का सेवन लाभकारी है।

लाॅकडाउन के चलते महीनों तक बच्चों का अधिकांश वक्त कंप्यूटर, ऑनलाइन लैक्चर, इंटरनेट, सोशल मीडिया, टीवी, लैपटाॅप, मोबाईल गेम आदि में बीता है। जिसके चलते उनमें नींद की कमी, शारीरिक असंतुलन, पीठ व गर्दन में दर्द, आंखों का ड्राई होना, खाने के पैटर्न में बदलाव आदि समस्याएं हो सकती हैं। इस बारे में डा. रुचिका का कहना है कि मौजूदा समय में बच्चों को दैनिकरूप से व्यायाम, घरों से बाहर वाॅकिंग करने, घूमने-फिरने को लेकर उन्हें प्रेरित करने के साथ साथ उन्हें प्रकृति और विभिन्न खेलों से जोड़ने की आवश्यकता है।

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