कुंभ मेले में रमता पंचों, धर्म ध्वजा और पेशवाई का महत्व

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कुंभ मेले में शाही स्नान पर्व से पहले विभिन्न अखाड़ों के रमता पंचों का कुंभ नगरी में वैदिक विधि विधान के साथ शोभा यात्रा के रूप में नगर प्रवेश होता है रमता पंच देश के विभिन्न राज्यों से कुंभ नगरी में स्थित अपने-अपने अखाड़ों में एकत्र होते हैं और वहां से वह शोभा यात्रा के रूप में अपने-अपने अखाड़ों की छावनी में बैंड बाजों, प्राचीन वाद्य यंत्रों,अस्त्र शस्त्रों और अपने देवताओं के साथ काफिले के रूप में नगर परिक्रमा करते हुए अपनी-अपनी छावनी में प्रवेश करते हैं इन रमता पंचों का शहर में जगह-जगह श्रद्धालु फूल मालाओं से स्वागत करते हैं रमता पंच कुंभ मेले के संचालन का काम अपने-अपने अखाड़ों की ओर से करते हैं रमता पंचों की मुख्य नियंत्रक संचालक समिति को अष्ट कौशल कहते हैं जिसमें अखाड़ा के वरिष्ठ महन्त अष्ट कौशल महंतों के रूप में अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालते हैं जो अखाड़े की सर्वोच्च कार्यदाई संचालन समिति होती है जिनकी संख्या आठ होती है यह कुंभ के सभी कार्यों का संचालन अखाड़े की ओर से करते हैं सर्वोच्च अधिकार प्राप्त अष्ट कौशल महंतों का विशेष सम्मान होता है रमता पंचों के अपनी छावनी में प्रवेश के बाद अखाड़ों के परिसर में स्थित चरण पादुका स्थान पर धर्म ध्वजा स्थापित की जाती है इस धर्म ध्वजा का विशेष महत्व है इस धर्म ध्वजा में एक 1 गज की दूरी पर दशनामी संन्यासी अखाड़ों में 52 मणियों की प्रतीक के रूप में 52 बांस के टुकड़े लगाए जाते हैं और इस धर्म ध्वजा के ऊपर भगवा ध्वज फहराया जाता है इस धर्म ध्वजा के समारोह में अखाड़े के अष्ट कौशल महन्त भाग नहीं लेते हैं क्योंकि वह अपनी अपनी छावनी में रमता पंचों को संचालित करते हैं इस धर्म ध्वजा समारोह के बाद निर्धारित तिथि के अनुसार अपनी-अपनी छावनी से अखाड़ों के साधु संत अष्ट कौशल महंतों के साथ बहुत बड़ी पेशवाई के रूप में नगर परिक्रमा करते हुए अपने-अपने अखाड़ों में प्रवेश करते हैं इन पेशवाई का नेतृत्व अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर करते हैं इस पेशवाई में सबसे पहले अखाड़ों के निशान देवता चलते हैं उसके बाद अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर का रथ चलता है और इस पेशवाई में अखाड़ों के अष्ट कौशल श्री महन्त रमता पंचों के साथ चलते हैं उसके बाद अखाड़ों के महन्त महामंडलेश्वर विभिन्न रत्नों में सवार होकर पेशवाई में भाग लेते हैं यह पेशवाई एक तरह से अखाड़ों की दिव्यता भव्यता और उनकी आर्थिक सामरिक शक्ति का प्रतीक मानी जाती है और वे अपना प्रदर्शन करते हैं इन पेशवाई में नागा साधु आकर्षण का मुख्य केंद्र होते हैं साथ ही इस पेशवाई में घोड़े हाथी ऊंट बड़ी तादाद में शामिल होते हैं नागा संन्यासी अपने पारंपरिक हथियारों के साथ अपनी विभिन्न शौर्य कलाओं का प्रदर्शन करते हुए चलते हैं विभिन्न अखाड़ों की पेशवाई में इन साधु-संतों पर हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा भी की जाती है और नगर प्रवेश के समय विभिन्न रास्तों में श्रद्धालु साधु संतों के ऊपर पुष्प वर्षा कर और माला पहनाकर उनकी आरती उतारकर उनका अभिनंदन करते हैं इन पेशवाई में विभिन्न अखाड़े विभिन्न राज्यों की लोक कलाओं का प्रदर्शन करते हैं और जिस राज्य में कुंभ होता है उस राज्य की लोक कलाओं और सांस्कृतिक धरोहर का भी प्रदर्शन पेशवाई में किया जाता है पेशवाई नगर भ्रमण करते हुए अपने अपने अखाड़ों में प्रवेश करती है और जहां से पूरे कुंभ का संचालन होता है और अखाड़े की पेशवाई अलग-अलग निर्धारित तिथियों में निकाले गए मुहूर्त के अनुसार निकाली जाती हैं और पेशवाई की पावन रस्म पूरी होने के बाद अखाड़ों में कुंभ की गतिविधियां संचालित होती हैं और अखाड़ों से ही साधु संत महंत महामंडलेश्वर मुख्य शाही स्नान पर्वों में दिव्य भव्य शोभायात्रा के रूप में जाते हैं श्रद्धालु इन सिद्ध साधकों की चरण रज को अपने अपने माथे पर लगाकर पुण्य के भागी बनते हैं
विभिन्न संप्रदायों के तेरह अखाड़े
पूरे देश भर में विभिन्न संप्रदायों के तेरह अखाड़े स्थित हैं अत्यंत प्राचीन अखाड़ों में आदि जगदगुरू शंकराचार्य द्वारा करीब पच्चीस सौ साल पहले स्थापित दशनामी संन्यासी परंपरा के सात अखाड़े हैं इन सात अखाड़ों में पंचायती श्री निरंजनी अखाड़ा पंचायती श्री आनंद अखाड़ा श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा श्री पंचायती आवाहन अखाड़ा श्री पंच अग्नि अखाड़ा श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा एवं श्री पंच दशनाम अटल अखाड़ा शामिल है जिनमें छह अखाड़े भगवाधारी दस नाम नागा संन्यासियों के हैं जो शिखा एवं सूत्र का त्यागकर कर विजिया होम संस्कार द्वारा अपने-अपने श्राद्ध करके अवशेष के रूप में भगवान शिव के गण के रूप में धर्म प्रचार करते हैं और समाज की रक्षा करते हैं दशनामी संन्यासी अखाड़ों में नागा संन्यासी अखाड़ों में ही रमता पंचों में अष्ट कौशल महंतों की परंपरा है जबकि ब्रह्मचारियों के अग्नि अखाड़ों में अष्ट कौशल महंतों की परंपरा नहीं है क्योंकि अग्नि अखाड़े के ब्रह्मचारी श्वेत वस्त्र धारण करते हैं और शिखा और सूत्र यानी सिर पर चोटी और तन पर जनेऊ धारण करते हैं जबकि नागा संन्यासी सिर पर शिखा यानी चोटी और तन पर जनेऊ यानी सूत्र का त्याग करते हैं दशनामी संन्यासी अखाड़े शिव के अनुयाई यानी सहमत वाले होते हैं
दशनामी अखाड़ों के बाद बैरागी पंथ की तीन अणियां अखाड़ों के रूप में कुंभ मेले में शाही स्नान ओं में शामिल होती हैं बैरागी संप्रदाय के विभिन्न खालसा होते हैं बैरागी अखाड़े भगवान श्री राम के उपासक होते हैं इन्हें रामा दल भी कहते हैं
सिख पंथ के प्रवर्तक श्री गुरु नानक देव जी की एक बेटे भगवान श्री चंद्राचार्य ने श्री उदासीन पंथ की स्थापना की थी उन्हें शिव का अवतार माना जाता है उदासीन संप्रदाय के दो अखाड़े श्री पंचायती उदासीन बड़ा अखाड़ा निर्वाण और श्री उदासीन पंचायती अखाड़ा हैं सिख पंथ के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा निर्मल पंथ की स्थापना की गई थी निर्मल संतो को उन्होंने संस्कृत का अध्ययन करने के लिए बनारस भेजा था इस तरह निर्मल संतों का श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा है इन सब आध्यात्मिक और धार्मिक विचारधारा के संतो को मिलाकर कुल तेरह अखाड़े हैं और इन सभी अखाड़ों का संगठन अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद है कुंभ के अवसर पर यह सभी अखाड़े अपनी-अपनी पेशवाई भव्य रुप में निकालते हैं और इनके रमता पंचों का नगर प्रवेश पेशवाई से पूर्व होता है और मुख्य शाही स्नान में यह सभी अखाड़े क्रमवार कुंभ स्नान के लिए भव्य दिव्य शोभायात्रा के रूप में जाते हैं जो कुंभ का विशेष आकर्षण होता है हर अखाड़े की छावनी और अखाड़े में रोज सुबह शाम संध्या आरती और आध्यात्मिक कार्यक्रम माहौल को खुशनुमा और दिव्य भव्य बना देते हैं यही अखाड़ों की अपनी आध्यात्मिक शक्ति है जो मनुष्य को मोक्ष और शांति प्रदान करती है
(लेखक पंचायती श्री निरंजनी अखाड़ा के सचिव, श्री अष्ट कौशल महन्त एवं श्री मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं)

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