रंग पंचमी पर्व का आध्यात्मिक महत्व,रंग पंचमी: देवी-देवताओं की होली का महापर्व, द्वापर में रंग पंचमी के दिन यमुना के तट पर कृष्ण और राधा ने खेली थी होली, देहरादून में रंग पंचमी के दिन से शुरू होता है प्राचीन एवं ऐतिहासिक झंडा मेला, उदासीन संप्रदाय से जुड़े सिद्ध संत रंग पंचमी के दिन झंडा मेला के दर्शन कर अपनी सिद्ध साधना को करते हैं पूरा और चैत्र नवरात्र में विंध्यवासिनी देवी मंदिर में करते हैं पूजा
रंग पंचमी पर्व का आध्यात्मिक महत्व,
रंग पंचमी: देवी-देवताओं की होली का महापर्व,
भारतवर्ष तीज-त्योहारों का देश माना जाता है। यह मान्यता प्रचलित है कि भारत में हर कोस में पानी, भाषा और तीज-त्यौहार बदल जाते हैं और हमारी संस्कृति बहुआयामी और बहुमुखी है। हमारे यहां भाषा, धर्म, पंथ और संस्कृति की विभिन्नताओं में एकता के दर्शन होते हैं और यही सांस्कृतिक और आध्यात्मिकता हमें एकता के सूत्र में पिरोती है। फाल्गुन मास हमारे यहां मौज-मस्ती का महीना माना जाता है क्योंकि फाल्गुन मास की पूर्णमासी के दिन हमारे यहां होली का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है और होली सामाजिक समरसता का प्रतीक मानी जाती है जो जाति, धर्म, पंथ से दूर हम सबके अंदर भाईचारे और सामाजिक एकता का भाव पैदा करती है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन होली का दहन किया जाता है,जो बुराई पर सच्चाई की जीत मानी जाती है और पूर्णिमा के अगले दिन सनातन धर्म का प्रथम महीना चैत्र शुरू होता है और चैत्र मास के प्रथम दिन यानी चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के दिन धुलंदी यानी होली के रंग का पर्व धूमधाम से खेला जाता है। इस दिन सभी लोग होली के रंग में रंगे रहते हैं। होली की प्राचीन एवं सनातन सांस्कृतिक परंपरा में फाल्गुन मास में मनाये जाने वाले होली महापर्व की तरह चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की पंचमी को रंग पंचमी कहा जाता है और रंग पंचमी का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से विशेष महत्व है। सनातन धर्म के शास्त्रों के अनुसार चैत्र कृष्ण पक्ष की रंग पंचमी को देवी-देवताओं की होली का महापर्व माना जाता है और जो बहुत ही शुभ और कल्याणकारी पर्व माना गया है, जिस दिन ब्रह्मा, विष्णु, महेश सभी देवी-देवताओं के साथ पृथ्वी पर अवतरित होकर एक साथ यमुना के तट पर होली खेलते हैं। रंग पंचमी की आध्यात्मिक छटा कुछ और ही होती है जिसकी आध्यात्मिक ऊर्जा को श्रद्धालु अपने अंतर मन की शक्ति से ही अनुभव कर सकते हैं। होली का महापर्व फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन होलाष्टक से शुरू होता है और जो फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की रंग भरी एकादशी के दिन धूमधाम से मनाया जाता है रंगभरी एकादशी के दिन काशी में गंगा के तट पर शिव पार्वती होली खेलते हैं और दोनों एक दूसरे के गुलाल-अबीर लगाते हैं और उसके बाद यह महापर्व अपने पूर्ण यौवन और उत्साह उमंग को समेटे हुए फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है और इसकी समाप्ति इस धरा धाम पर इस दिन नहीं होती है बल्कि इसके उपरांत भी रंग और उमंग चैत्र मास के कृष्णपक्ष की पंचमी तिथि तक बना रहता है और रंग पंचमी के दिन देवी-देवताओं की होली के साथ इस मौज मस्ती वाले महापर्व अपनी पूर्ण आध्यात्मिकता के साथ संपन्न होता है। रंग पंचमी पर्व को लेकर यह मान्यता मानी जाती है कि इस पवित्र पावन दिन द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने राधा रानी के साथ यमुना जी के तट पर वृंदावन में होली खेली थी और और इस मनमोहक और आकर्षक तथा भक्ति से सराबोर दृश्य को देखकर देवी-देवताओं ने उन पर पुष्प वर्षा की थी। राधा-कृष्ण की इस होली में उनके साथ ग्वाले और गोपियों ने भी रंगोत्सव मनाया था। इसीलिए आज भी यह मानता है कि चैत्र कृष्ण पक्ष की पंचमी यानी रंग पंचमी के दिन भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा जी सभी देवी-देवताओं के साथ यमुना जी के तट पर होली खेलने आते हैं। इसीलिए इस दिन श्रद्धालु भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा जी की विशेष रूप से पूजा करते हैं और देवी-देवताओं का ध्यान करते हुए उन्हें हवा में अबीर और गुलाल चढ़ाते है। धार्मिक मान्यता है कि रंग पंचमी पर्व के दिन लाल और गुलाबी रंग के गुलाल को पूजा में अर्पित करना अत्यंत ही शुभ माना गया है और इस दिन श्रद्धालुओं को श्री राधा-कृष्ण सहित सभी देवी-देवताओं का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त होता है। रंग पंचमी के दिन सूर्योदय के उपरांत लक्ष्मी और नारायण, भगवान श्रीकृष्ण और राधा की विधि-विधान से पूजा करना कल्याणकारी माना जाता है। रंग पंचमी की पूजा के लिए सर्वप्रथम घर में पूजा स्थल पर ईशान कोण में एक मेज पर पीला कपड़ा बिछाकर उस पर राधा-कृष्ण की मूर्ति को स्थापित कर गंगा या यमुना जी के जल से स्नान कराया जाता है और रोली, चंदन, वस्त्र, गुलाल आदि से राधा-कृष्ण की प्रतिमा या चित्र का अभिषेक किया जाता है और उन्हें नैवेद्य चढ़ाया जाता है।पूजा के अंत में राधा-कृष्ण की आरती उतारी जाती है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में रंग पंचमी का त्यौहार एक अलग ढंग से ही मनाया जाता है। इस दिन देहरादून में दरबार साहिब में ऐतिहासिक और प्राचीन झंडा मेले का शुभारंभ होता है और दरबार साहिब में स्थापित झंडे साहिब का नए वस्त्र पहनाकर अभिषेक किया जाता है और देश के कोने-कोने से श्रद्धालु झंडे मेले में भाग लेने आते हैं और अपनी मन्नत मांगते हैं और मन्नत मांगने के लिए झंडा साहिब में रुमाल चढ़ाते हैं और मन्नत पूरी होने पर फिर अगले साल रंग पंचमी के दिन रुमाल चढ़ाने आते हैं और प्रसाद चढ़ाकर झंडा साहिब का आभार व्यक्त करते हैं। उदासीन संप्रदाय से जुड़े हुए साधु संत सिद्ध साधक गंगा और यमुना के पावन तट पर साधना करते हैं। और यह साधु संत गंगा के पवित्र पावन तट पर स्थित श्मशान घाट में महाशिवरात्रि के दिन प्रवेश करते हैं और लगभग सवा महीने तक धुना लगाकर साधना करते हैं और रंग पंचमी के दिन अपनी शमशान साधना पूर्ण कर देहरादून में दरबार साहब में स्थित झंडे मेले में सम्मिलित होकर झंडा साहिब को प्रणाम करते हैं और उसके बाद हरिद्वार से करीब 20-25 किलोमीटर दूर पौड़ी गढ़वाल जनपद में स्थित विंध्यवासिनी मंदिर में चैत्र नवरात्र का विशेष पूजन करते हैं। इसीलिए रंग पंचमी और चैत्र मास का सनातन धर्म में विशेष महत्व है और चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन से सनातन धर्म मानने वालों का नव वर्ष नव संवत्सर शुरू होता है और चैत्र नवरात्रि का विशेष पूजन प्रारंभ होता है और इसी महीने चैत्र नवरात्रि की शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन रामनवमी का पर्व यानि भगवान श्री राम का प्रकटोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है और चैत्र पूर्णिमा के दिन धूमधाम से हनुमान जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। चैत्र शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी के दिन हरिद्वार में चंडी देवी मंदिर में चंडी चौदस का मेला धूमधाम से मनाया जाता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं और मां चंडी देवी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। शिव की ससुराल कनखल में दक्षेश्वर महादेव मंदिर परिसर के पास स्थित सिद्ध पीठ शीतला माता मंदिर में चैत्र कृष्ण सप्तमी के दिन शीतला माता सप्तमी का विशेष पूजन होता है और इसी दिन इस मंदिर के समीप स्थित सिद्ध साधक ब्रह्मचारी जी गुरुजी की पुण्यतिथि चैत्र कृष्ण सप्तमी के दिन मनाई जाती है और विशेष भंडारे का आयोजन किया जाता है। और इस साल चैत्र कृष्ण पक्ष सप्तमी तिथि 10 मार्च को पड़ रही है। सनातन पंचांग के अनुसार इस साल चैत्र माह के कृष्णपक्ष की पंचमी तिथि 7 मार्च को सायंकाल 7:17 बजे से लेकर अगले दिन 8 मार्च को रात्रि 9:10 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार रंग पंचमी का महापर्व इस साल 8 मार्च को मनाया जाएगा।







