भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून की बदल रही है दिशा और दशा,पासिंग आउट परेड में अंतिम पग पार कर इतिहास रचा महिला कैडेट्स ने, पहली बार आईएमए देहरादून में महिला कैडेट्स ने पुरुष कैडेट्स के साथ किया कदमताल,
भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून की बदल रही है दिशा और दशा,पासिंग आउट परेड में अंतिम पग पार कर इतिहास रचा महिला कैडेट्स ने, पहली बार आईएमए देहरादून में महिला कैडेट्स ने पुरुष कैडेट्स के साथ किया कदमताल,
देहरादून।
13 जून 2026 का दिन देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) के लिए एक ऐतिहासिक क्षण का गवाह बना और इसकी साक्षी बनी भारत की महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू।आईएमए देहरादून के ऐतिहासिक चेटवुड परेड मैदान ने एक नया इतिहास रचा,जो भारतीय सेना के 93 वर्ष लंबे इतिहास में पहली बार घटित हुआ है।आईएमए की परेड में महिला कैडेट्स ने एक नया इतिहास रचकर मातृशक्ति का परिचय दिया। इस बार की पासिंग आउट परेड में पहली बार महिला कैडेट्स ने पुरुष कैडेट्स के साथ “अंतिम पग” पार किया। इस बार की पासिंग आउट परेड में पहली बार महिला कैडेट्स ने आधिकारिक रूप से महिला कैडेट पुरुष कैडेट्स के साथ “अंतिम पग” पार कर भारतीय सेना में स्थायी कमीशन हासिल किया है। यह केवल एक सैन्य समारोह नहीं, बल्कि भारतीय समाज, सेना और महिलाओं की बदलती भूमिका को दर्शाता है। भारतीय सैन्य अकादमी में एनडीए से आई पहली महिला कैडेट्स के बैच में नौ महिला कैडेट स्थायी कमीशन के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर रही थीं। ये वे महिला कैडेट्स हैं, जिन्होंने तीन वर्ष राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए), खड़कवासला में और उसके बाद आईएमए में सैन्य प्रशिक्षण पूरा किया है।भारतीय सेना में महिलाओं की भागीदारी कोई नई बात नहीं है। अगली बार दिसंबर में होने वाली पासिंग आउट परेड में भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में महिला कैडेट्स की संख्या बढ़कर 26 हो जाएगी, जो अपने में एक रिकॉर्ड होगा। 1992 में पहली बार महिलाओं को चिकित्सा सेवाओं के अतिरिक्त अन्य शाखाओं में शॉर्ट सर्विस कमीशन के माध्यम से अधिकारी बनने का अवसर मिला था। लेकिन उन्हें स्थायी कमीशन तथा एनडीए और आईएमए जैसी प्रतिष्ठित सैन्य प्रशिक्षण संस्थाओं में पुरुषों के समान प्रवेश नहीं मिलता था। 2021 में जब सर्वोच्च न्यायालय ने महिलाओं को एनडीए प्रवेश परीक्षा में शामिल होने की अनुमति देने का ऐतिहासिक निर्णय दिया। इसके बाद संघ लोक सेवा आयोग ने महिलाओं के लिए एनडीए के द्वार खोले। 2022 में पहली बार 17 कैडेट्स के साथ समान सैन्य एवं शैक्षणिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। पहली बार महिला कैडेटों का “अंतिम पग” पार करना आईएमए के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत माना जा रहा है। दिवंगत लेफ्टिनेंट कर्नल अवनीश प्रताप सिंह की पत्नी श्रीमती साधना सिंह कहती है कि भारतीय थल सेना में यह परिवर्तन केवल महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय सेना की पेशेवर क्षमता और आधुनिक सोच का भी परिचायक है। भारतीय सेना लंबे समय तक पुरुष प्रधान संस्था मानी जाती रही है। लेकिन पिछले एक दशक में परिस्थितियाँ तेजी से बदली हैं। आज महिलाएं लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, युद्धपोतों पर तैनात हैं, सीमा क्षेत्रों में सेवा दे रही हैं और विभिन्न कमांड जिम्मेदारियां निभा रही हैं।महिलाओं को स्थायी कमीशन देने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और उसके बाद एनडीए में प्रवेश की अनुमति ने इस बदलाव को संस्थागत स्वरूप प्रदान किया। अब सेना में महिला अधिकारी केवल सहायक भूमिका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नेतृत्व की मुख्यधारा का हिस्सा बन रही हैं। 1932 में स्थापित भारतीय सैन्य अकादमी ने अब तक हजारों अधिकारियों को भारतीय सेना को सौंपा है। यहां से निकले अधिकारियों ने द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर 1947, 1962, 1965, 1971 और कारगिल युद्ध तक देश की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन लगभग नौ दशक तक आईएमए का प्रशिक्षण केवल पुरुष कैडेटों तक सीमित रहा। और अब इस तरह से भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून की दिशा और दशा समय के साथ-साथ बदल रही है। भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून पर पूरे राष्ट्र को गर्व है। जो वीरता सेवा और साहस का प्रतीक है और इसकी त्रिवेणी है।



