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प्रवासियों के दर्द को महसूस कराती है निधि ठाकुर की लेखनी,

देहरादून की मूल निवासी रही प्रवासी भारतीय निधि ठाकुर ने विदेश में खासकर अमेरिका में रह रहे प्रवासी भारतीयों के अपनी मूल जड़ों के एहसास को, उनके अंदर की ठीस अपनी देखने के माध्यम से बहुत ही सरल और आत्मीयता से प्रस्तुत किया है। और प्रवासी भारतीयों के मन मस्तिष्क के भीतर चल रहे द्वंद्व को बहुत खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है।


प्रवासियों के दर्द को बयां करती हुई निधि ठाकुर ने एक पुस्तक लिखी है, इस पुस्तक का नाम ‘व्हेन शी मैरिड डॉ. पाटेकर एंड अदर स्टोरीज’
है,यह पुस्तक बॉलीवुड की प्रसिद्ध फिल्म तारिका माधुरी दीक्षित से प्रेरणा लेकर लिखी गई है, जो बॉलीवुड की चकाचौंध को छोड़कर अमेरिका में जाकर बस गई थी और एनआरआई बन गई थी। और वह भी अमेरिका के एक छोटे से शहर में बसी। जहां पर उन्हें कुछ लोगों ही जानते होंगे कि वह बॉलीवुड की एक मशहूर सिने तारिका हैं। जैसे आज प्रियंका चोपड़ा तो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है कि वह बॉलीवुड की फिल्म अभिनेत्री है। परंतु जब माधुरी दीक्षित अमेरिका में बसी थी तब वैश्वीकरण का इतना प्रभाव नहीं था। थे माधुरी दीक्षित को अमेरिका के एक छोटे से शहर में अपनी पहचान अपनी अस्मिता ढूंढने के लिए जो संघर्ष करना पड़ा होगा, उन सब घटनाओं की कल्पना करते हुए और माधुरी दीक्षित के जीवन से प्रेरणा लेकर मैंने इस कहानी की रचना की है। निधि ठाकुर ने यह पुस्तक अमेरिका में माधुरी दीक्षित को भेंट की है। इस पुस्तक के हर अध्याय के आखिर में हिंदी में एक कविता लिखी गई है, जो प्रवासी भारतीयों की भावनाओं को प्रकट करती है। यह पुस्तक उन्होंने 1999 से 2010 के बीच की अमेरिका में घटित विभिन्न घटनाओं से प्राप्त अनुभव के आधार पर लिखी है।
निधि बताती है कि जब 1999 में वह पढ़ने के लिए भारत से अमेरिका के लिए अकेले ही रवाना हुई तो उन्होंने कल्पना की थी कि वह भारत में अपनी दिक्कतें छोड़कर अमेरिका जा रही हैं और वहां जीवन का बड़ा मजा आएगा परंतु और परंतु जब अमेरिका में कई दिक्कतों से उन्हें दो-चार होना पड़ा तो उन्हें भारत की याद आई, अपने घरवालों, अपने कुत्ते तक की याद आई और घर पर अखबार डालने वाले भैया तक की याद आई। तब उन्हें महसूस हुआ कि बाहर की दुनिया क्या होती है और अपना देश और अपना घर क्या होता है इसका अंतर उन्होंने अमेरिका में महसूस किया। और इन सब परिस्थितियों ने इस पुस्तक और कविताओं को जन्म दिया।
देहरादून में ऊषा कॉलोनी में एक कैफे में इस पुस्तक का विमोचन किया गया, पुस्तक विमोचन के समय उत्तराखंड के पूर्व मुख्य सचिव इंदू पांडे, पूर्व सचिव संजीव चोपड़ा तथा कई लेखक और गणमान्य लोग उपस्थित थे।
निधि ठाकुर का कहना है कि भले ही हम अमेरिका में बस गए, परंतु हमारी मूल जड़े तो भारत में ही जमी हुई हैं और हम अपनी संस्कृति को नहीं भूल पाए हैं और वहां रहकर भी अपना बचपन और भारत की यादें हमेशा हमारे जहन में ताज़ा रहती हैं। उन्होंने पुस्तक में 2020 में कोरोना के समय जो संकट आया था, उसका भी दर्द बखान किया है। उस समय जो अकेलापन वहां महसूस किया गया और जो मन को पीड़ा हुई,उसने हमें भारत में अपने रहने के दिनों की यादें खूब दिलाई। निधि बताती है कि कोरोना काल के दौरान व्हाट्सएप की इतनी सुविधा नहीं थी, फोन करने में पैसा बहुत लगता था, तब हमारे पास इतना पैसा नहीं था कि हम अपने परिजनों से भारत में अधिक समय तक बात कर सके तब हम टेलीफोन में कम ही बात कर सकते थे। तब हमें अकेलापन और अधिक सताता था।
9/11 को याद करते हुए निधि कहती है कि इस घटना के बाद हम गेहुंए रंग वाले भारतीयों को शुरू में एक अलग सा अनुभव हुआ और लोग हमारे को एक अलग तरह से देखने लगे थे और अमेरिकी वासियों का हमारे प्रति नजरिया बदल सा गया था, परंतु धीरे-धीरे जब हम भारतीयों के बारे में उन्हें नजदीक से पता लगा तो उनकी धारणाएं हमारे बारे में बदली। परंतु वह वक्त बहुत ही कठिन था। जो हमारी अस्मिता, विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहा था,परंतु धीरे-धीरे हमारे आचरण,व्यवहार, विचार से सारी धुंध साफ हुई।
निधि ठाकुर इस समय अमेरिका में न्यूजर्सी में पढ़ाती हैं और उनकी प्रारंभिक शिक्षा देहरादून में सेंट जोसेफ अकादमी, डीएवी कॉलेज देहरादून और बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में हुई। पीएचडी उन्होंने अमेरिका के एक विश्वविद्यालय से की। निधि ठाकुर अमेरिका में रहते हुए भी भारतीय संस्कृति और संस्कारों  से ओत-प्रोत है।

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