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देसंविवि में धार्मिक अध्ययन के विकास पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठीमानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना का विकास आवश्यक : डॉ चिन्मय पण्ड्या

देसंविवि में धार्मिक अध्ययन के विकास पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठीमानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना का विकास आवश्यक : डॉ चिन्मय पण्ड्या

धार्मिक अध्ययन का उद्देश्य वैश्विक धर्म को समझना : डॉ. फिलिप जोजेफ क्राउज

हरिद्वार।देव संस्कृति विश्वविद्यालय में धार्मिक अध्ययन के विकास पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ। संगोष्ठी का शुभारंभ प्रज्ञागीत से हुआ।इस अवसर पर देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि विभिन्न धार्मिक परंपराओं के बीच संवाद, सहयोग और पारस्परिक समझ आज के वैश्विक समाज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना का विकास भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह विचारधारा युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा स्थापित अखिल विश्व गायत्री परिवार के आदर्शों से भी पूर्णत: साम्य रखती है। आचार्यश्री ने मानवता के आध्यात्मिक उत्थान के लिए धर्मों के समन्वय, वैश्विक सद्भाव तथा मानवीय मूल्यों पर आधारित जीवन-दृष्टि का प्रतिपादन किया। उनका प्रतिपादित दर्शन एकता, समता, ममता, सुचिता विश्व की विविध आध्यात्मिक परंपराओं के बीच संवाद, सहयोग और सहअस्तित्व की भावना को सुदृढ़ करता है। इसी भावना के अनुरूप देव संस्कृति विश्वविद्यालय द्वारा ऐसे अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संवाद आयोजित किए जा रहे हैं, जो वैश्विक स्तर पर आध्यात्मिक एकता, सांस्कृतिक समन्वय और मानव कल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।जॉन पॉल द्वितीय कैथोलिक विश्वविद्यालय, ल्यूब्लिन, पोलैंड में मूलभूत मसीह-विज्ञान तथा कलीसिया-विज्ञान विभाग के रेव. डॉ. फिलिप जोजेफ क्राउजे ने जॉन पॉल द्वितीय कैथोलिक विश्वविद्यालय, ल्यूब्लिन में एक शताब्दी से अधिक समय में विकसित धार्मिक अध्ययन की परंपरा का विस्तृत परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने विश्वविद्यालय के संस्थापक इद्ज़ी राद्ज़िशेव्स्की की मूल भावना का उल्लेख किया जिसमें आस्था और तर्क को सत्य के एक ही क्षितिज का अंग माना गया है। उन्होंने बताया कि 1918 में स्थापना के प्रारंभिक काल से ही वहाँ बाइबिल भाषाओं के साथ-साथ भारतविद्या जैसे विषयों को भी पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया, जिससे यूरोप के बाहर की धार्मिक परंपराओं को समझने की शैक्षणिक दृष्टि विकसित हुई। साम्यवादी काल में भी यह विश्वविद्यालय सोवियत क्षेत्र का एकमात्र स्वतंत्र कैथोलिक विश्वविद्यालय बना रहा और यहाँ धार्मिक अध्ययन को दर्शन, धर्मशास्त्र तथा मानवशास्त्र के साथ संवाद के रूप में विकसित किया गया। उन्होंने कहा कि धार्मिक अध्ययन का उद्देश्य किसी एक वैश्विक धर्म की स्थापना करना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि विभिन्न संस्कृतियाँ मानव के पारलौकिक तथा आध्यात्मिक अनुभवों को किस प्रकार अभिव्यक्त करती हैं।इस अवसर पर विवि के साथ अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग के संदर्भ में सार्थक संवाद संपन्न हुआ। इस दौरान ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, जर्मनी, कनाडा, सीरिया, यूक्रेन, उज़्बेकिस्तान, जापान, रोमानिया, ईरान सहित 37 देशों के प्रतिभागी एवं विवि के अनेक विद्यार्थी आदि मौजूद रहे। ————————————————————-शांतिकुंज में जन्मशताब्दी अनुयाज हेतु वर्चुअल राष्ट्रीय संगोष्ठीयह वर्ष तीन सौभाग्यों का अद्भुत त्रिवेणी संगम है: डॉ चिन्मय पण्ड्याहरिद्वार 17 मार्च।अखिल विश्व गायत्री परिवार के मुख्यालय शांतिकुंज में माता भगवती देवी शर्मा की जन्मशताब्दी तथा अखण्ड दीप के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य समारोह से उभरे संकल्पों को पूरा करने और देशव्यापी अनुयाज कार्यक्रमों को गति देने के उद्देश्य से एक वर्चुअल राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए अखिल विश्व गायत्री परिवार के युवा प्रतिनिधि डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि यह जन्मशताब्दी वर्ष उन संकल्पों को धरातल पर उतारने का समय है जो समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए किए गए हैं। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपने संकल्प के प्रति अडिग रहता है, वही अपने सौभाग्य को साकार कर पाता है। जीवन में कुछ सौभाग्य वर्षों की प्रतीक्षा और कठोर तप के पश्चात प्राप्त होते हैं। यह वर्ष हमारे लिए तीन महा-सौभाग्यों का अद्भुत त्रिवेणी संगम लेकर आया है— अखंड दीपक के प्रज्वलन के 100 वर्ष, पूज्य गुरुदेव की महान तप-साधना के 100 वर्ष और वंदनीया माताजी के जन्म के 100 वर्ष। युवा प्रतिनिधि डॉ. पण्ड्या ने बल देकर कहा कि अभी तो यज्ञ शुरू हुआ है, केवल पहली आहुति पड़ी है। यह शताब्दी वर्ष मात्र उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि जन-जन के भीतर उस पीड़ा और कसक को जगाने का है, जिससे पूज्य गुरुदेव द्वारा देखे गए मानवता के कल्याण के स्वप्न साकार हो सकें। उन्होंने बताया कि आगामी समय में देशभर में युवा सम्मेलन, नारी सम्मेलन, 108 कुण्डीय यज्ञ और जनजागरण कार्यक्रमों की शृंखला आयोजित की जाएगी। ये कार्यक्रम नवरात्रि के बाद प्रारंभ होकर मई माह तक निरंतर चलेंगे। इन कार्यक्रमों की समीक्षा के लिए समय-समय पर शांतिकुंज में सम्मेलन भी आयोजित किए जाएंगे। इस अभियान की सफलता के लिए हम सभी का लक्ष्य और संकल्प एक होना चाहिए।इससे पूर्व संगोष्ठी में व्यवस्थापक श्री योगेन्द्र गिरि ने जन्मशताब्दी अनुयाज कार्यक्रमों की विस्तृत रूपरेखा से सभी को अवगत कराया। वहीं राष्ट्रीय जोन समन्वयक डॉ. ओ.पी. शर्मा ने जन्मशताब्दी अनुयाज क्रम को गति देने और इसे जन-जन तक पहुँचाने के लिए सभी कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया।संगोष्ठी में शांतिकुंज के मध्य जोन, उत्तर जोन, पूर्वी जोन, दक्षिण भारत जोन तथा एनसीआर जोन सहित देशभर के जोन समन्वयकों ने अपने-अपने राज्यों में चल रहे कार्यक्रमों और आगामी योजनाओं की जानकारी साझा की। सभी ने एक स्वर में जन्मशताब्दी वर्ष को समाज जागरण का महाअभियान बनाने का संकल्प व्यक्त किया। वर्चुअल संगोष्ठी में उत्तराखण्ड, दिल्ली, बिहार, झारखण्ड, राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र सहित चौबीस से अधिक राज्यों के हजार से अधिक राज्य समन्वयक, जिला समन्वयकों सहित गायत्री परिवार के सक्रिय कार्यकत्र्तागण जुड़े।

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